क्या करू अब मीठा भी तीखा सा लगता है
अब भी तलब होती है पानी की ,मगर क्या करू अब ये भी फिका सा लगता है। शाम का इंतजार अब करता नहीं शौक से,
पता नहीं क्यों अब शाम भी दोपहर सा लगता हैं।
आजकल कलम की जरूरत लगती नहीं मुझे, पता नहीं क्यों, उंगलियों के तल्ले ही अब दबात से लगते है.
अब भी ललक होती है सुबह की, मगर क्या करू अब सुबह भी वीरान सा लगता है । दूर कहीं टोपी वाले को देखता हूं, मंदिर निहारते हुए, ना जाने क्यों अब भी वह कलाम सा लगता है। देखता हू शहर के बड़े दरख़्तो के नीचे, छोटे पौधों को तड़पते हुए,तो आज भी शहर मुझे शमशान सा लगता है। क्या करू अब मीठा भी, तीखा सा लगता है ।
अभिषेक गौरव
Sunday, October 27, 2019
मीठा भी तीखा सा लगता है
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