अब. मैं रोज़ झुक कर चलता हूं,
क्या बताऊं थोड़ा रुक कर चलता हूं,
देखा है मैंने दादाजी को ऐसे चलते हूए
ना जाने मैं ऐसे क्यों चलता हूं।
कहते है, बुढ़ापा भी बचपना सा होता है,
मगर किसी ने बताया नहीं, बचपना भी बुढ़ापा सा होता है!
उम्र की शुरुआत में ना जाने क्यों इतना बोझ है
बस लोग यूं ही कहते है,बस तुम्हारी ही तो मौज है ।
यू घर से जब निकलता हूं,कुछ दूर चलता हूं
तो बस यही सोचता हूं, बस्ते में किताबों के आलावा कितना कुछ और है, नन्हा सा जान हूं ,
ना जाने कितनों के सपनों का पहचान हू।
ना जाने लोग मुझे, क्या क्या बनाना चाहते हैं
दूसरों का चेहरा दिखा कर, दो - चार किताबें और लादना चाहते है, अपने उम्मीदों के आसमान में बेड़ियों से बांध कर उड़ाना चाहते है, अगर चल ना पाऊं तो बैसाखी थमा देना चाहते हैं।
ऐसे तो मैं थक जाऊंगा, चुप रहते रहते बहक जाऊंगा,
कैसे बताऊं की मै क्या चाहता हूं, बस अपने सपनों का आकार चाहता हूं, बिना बोझ के एक खुली उड़ान चाहता हूं
बस अपनी आंखों में खुद के लिए सम्मान चाहता हूं।
मगर अब मैं रोज़ झुक कर चलता हूं,
क्या बताऊं थोड़ा रुक कर चलता हूं।
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