मोोर्य कालिन गुफाओं के साथ हर हर महादेव
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हिन्दू धर्म के मान्यताओं के अनुसार श्रावण माह को बेहद पवित्र माना जाता है, इस पूरे महिने में भगवान शंकर कि पुजा- अर्चना भारत समेत विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में बड़े धूम धाम से की जाती है. इस माह में कई स्थानों पर श्रावणी मेले का आयोजन किया जाता है. उन्ही में से बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर जहाँ पर हर वर्ष लगने वाला श्रावणी मेला पर्यटकों अथवा श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव यहां पौराणिक पर्वत पर बाबा सिद्धेश्वर नाथ के रूप में विराजमान है. जिनके दर्शन के लिए लोग देश विदेश से आते है, बराबर को ‘बाणावर’ भी कहा जाता है. महाभारत कालीन जीवंत कृतियों में से एक यह मंदिर आज भी पुरातन शिल्पकृतियों में महिमामंडित प्राचीन आदर्शों से युक्त पूजन परंपरा को जीवित रखे हुए है। बराबर पहाड़ के शिखर पर अवस्थित सिद्धेश्वरनाथ को नौ स्वयंभू नाथों में प्रथम कहा जाता है। इनकी पूजन कथा शिवभक्त वाणासुर से संबंधित होने के कारण इसे ‘वाणेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। मंदिर तक जाने के लिए सीढीयां भी बनी हुई है।
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बराबर पर्वत भारतवर्ष के पुरातन ऐतिहासिक पर्वतों में एक है। 1100 फुट ऊंचे बराबर पर्वत को मगध का हिमालय भी कहा जाता है। यहां सात अदभुत गुफाएं भी बनी हुई है। जिनका पता अंग्रेजों के कार्यकाल में चला । इनमें से चार गुफाएं बराबर गुफाएं एवं बाकी तीन नागार्जुन गुफाएं कहलाती है। गुफाओं में अधिकांश गुफाएं मौर्य काल से संबंध रखती हैं जोकि भारत की सबसे पुरानी काटकर बनाई गई गुफाओं में से एक हैं। पर्यटन के लिहाज से भी ये काफी उपयुक्त स्थान है। ये पर्वत सदाबहार सैरगाह के रूप में प्राचीन काल से ही चर्चित है। किंवदंतियों के अनुसार पर्वत पर बनी गुफाएं प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के ध्यान साधना लगाने हेतु सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाई गई थी। हालाकि कई गुफाओं को बौद्ध बिक्षूओं के शरण गृह के रूप में जाना जाता है. यह एक मुख्य कारण है जिसकी वजह से अधिक मात्रा में बौद्ध धर्म के मानने वाले विदेशी अनुआयी भी यहाँ आते है.
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सावन माहिने में यहां लाखों श्रधालू गण अपनी आस्था भगवान शंकर के चरणों में अर्पित करते है.बीते कुछ वर्षों से यहां कांवरियों और डाक कांवरियों की संख्या में वृद्धि हुई है, काफी अधिक कष्ट प्रद रास्तों से होते हुए भगवान भोले शंकर के कई नारों को उद्घोष करते हुए सभी रास्ते को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं.
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बिहार के फतुहा शहर के गंगा नदी में स्नान कर वहीं से पवित्र जल लेकर बराबर पर्वत के लिए सभी प्रस्थान करते हैं। नंगे पांव 90 किलोमीटर की कष्टप्रद यात्रा कई तो बिना रुके 24 घंटे के अंदर ही पूरा कर लेते हैं ऐसे श्रद्धालुओं को डाक बम कहा जाता है। इनकी दिनचर्या तो अलग ही है। यह सभी पवित्र जल लेकर सीधे चल देते हैं रात दिन चल कर बाबा सिद्धेश्वर भगवान के द्वार बराबर पर्वत पर पहुंचते हैं। रास्ते में ना रुकना ना सोना और ना ही शंका का कोई निवारण करना होता है जो भी करना है वह जल अभिषेक के बाद ही करना होता है। वहीं इन सभी के लिए मंदिर प्रांगण में खास प्रबंध होता है इन्हें बिना किसी कतार में लगे शिवलिंग पर जल अर्पण करने का मौका मिलता है, जबकि और बाकी कावड़ियों को कतार बद्ध तरीके से जल अभिषेक करने का मौका मिलता है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में ऐसे डाक कांवड़िए सावन के महीने में हर दिन रवाना होते हैं।
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वहीं बच्चें, बूढ़े, जवान और महिलाएं कंधे पर कांवर या अपने पीठ पर पवित्र जल ले कर पैरों में पड़े छालों की प्रवाह किए बगैर ऐसे ही चलते हैं जैसे मानो इन्हें यह तकलीफ नहीं देते भगवान के नाम के गुण गाते हुए, बोल बम,बोल बम का नारा है बाबा एक सहारा है, हर हर महादेव, बोला बम बोल बम जौसे नारों का उद्घोष करते हुए बस चलते रहते हैं। हालांकि रास्ते में इनके लिए बने कई स्वयंसेवक उपचार केंद्र इन की मरहम पट्टी करते हैं, इनके लिए और कई तरह के प्रबंध करते हैं। इस क्रम में कई तरह की सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं, अगर कांवरिया का कोई समूह या कोई अकेला कांवरिया थक जाता है तो वह कहीं भी नहीं रुक सकता उसके लिए जगह-जगह पर स्वच्छ स्थान लोगों के सहयोग के द्वारा बनाया जाता है, सभी वहीं पर अपना कांवर जमीन पर ना रखकर उसके रखने के लिए बनाए गए स्थान पर ही रखते हैं , तथा उसके बाद उन्हें जो भी क्रियाकलाप करना होता है जैसे नहाना, कोई फलाहार करना तथा शंका इत्यादि के बाद उन्हें नहा कर फिर अपने कांवर को पूजा करने के बाद ही कांवर अपने कंधे पर तथा जल अपने पीठ पर लेकर वहां चलना होता हैं, वही रास्ते में आम लोग भी बोल बम के नारों के साथ इन कावड़ियों के हौसलों को भी बुलंद करते हैं। यहां कोई धनवान या गरीब नहीं होता रास्ते में सब एक समान होते हैं बस भगवान के प्रति श्रद्धा और करुणा लिए एक दूसरे की मदद करते हैं।

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बराबर यानी वाणावर फल्गु नदी के किनारे स्थित है अतः लगभग सभी कांवरियों को नदी में घुसकर नदी पार करना पड़ता है तथा सभी कठिनाइयों को पार करते हुए सबसे पहले कांवरिया पताल गंगा पहुंचते हैं वहां पुनः स्नान करने के बाद पर्वत की चढ़ाई शुरू करते हैं। पथरीला रास्ता मौसम की मार, कठिन और पर्वत की सीधी चढ़ाई भी इन श्रद्धालुओं के हौसले को डगमगा नहीं पाता है।
सावन के हर सोमवार जल अभिषेक का एक अलग ही महत्व है जिसकी वजह से उस दिन मंदिर में रोजाना से अधिक भीड़ होता है।
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हालांकि यहां लाखों लोग अपने निजी वाहन तथा समाजिक वाहन के माध्यम से भी आते हैं, वही पूजा अर्चना के बाद कई लोग वही पहाड़ों और वादियों के बीच ही अपना पूरा दिन अपने परिवार सगे संबंधियों के साथ बिताते हैं।
अतः हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले सभी लोगों के लिए यह पवित्र स्थल महत्वपूर्ण महत्व रखता है। राज्य के गया शहर से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह विरासत आज भी राष्ट्रीय स्तर पर अपने ऐतिहासिक और पौराणिक विशेषताओं के बाद भी कोई खास जगह नहीं बना पाया है।
अभिषेक गौरव
आपका ये कदम सराहनीय है कि आप बिहार के ऐतिहासिक स्थलों पर प्रकाश डालने की कोशिश की है। चूकि बिहार का इतिहास इतना गौरवशाली रहा है फिर भी यहाँ के ऐतिहासिक स्थलों को उतना बढ़ावा नही दिया गया अब तक। शायद यही कारण है कि कुछ ही गिने चुने जगह को लोग बिहार में घूमने लायक समझते है। इसी तरह अपने लेखनी से अपना योगदान देते रहिये।
ReplyDeleteVery informative..... और आपने एक महत्वपूर्ण बात उठाई है कि ऐसे हीं कई और धार्मिक स्थल अभी तक देश में एक प्रचलित जगह बनाने में असमर्थ रही है।
ReplyDeleteबहुत सराहनीय
ReplyDeleteकितने सरल तरीके से संछेप में आपने बराबर गुफाओं के इतिहास को बताते हुए और अभी के समय में यहां की लोकप्रियता को बहुत अच्छे से दर्शाया है.. 👍
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