Tuesday, May 26, 2020

पर्वत पर बैठे हैं महादेव

मोोर्य कालिन गुफाओं के साथ हर हर महादेव


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हिन्दू धर्म के मान्यताओं के अनुसार श्रावण माह को बेहद पवित्र माना जाता है, इस पूरे महिने में भगवान शंकर  कि पुजा- अर्चना  भारत समेत विश्व के विभिन्न  क्षेत्रों में बड़े धूम धाम से की जाती है. इस माह में कई स्थानों पर श्रावणी मेले का आयोजन किया जाता है. उन्ही में से बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर  जहाँ पर हर वर्ष लगने वाला श्रावणी मेला पर्यटकों अथवा श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव यहां पौराणिक पर्वत पर बाबा सिद्धेश्वर नाथ के रूप में विराजमान है. जिनके दर्शन के लिए लोग देश विदेश से आते है,  बराबर को ‘बाणावर’ भी कहा जाता है. महाभारत कालीन जीवंत कृतियों में से एक यह मंदिर आज भी पुरातन शिल्पकृतियों में महिमामंडित प्राचीन आदर्शों से युक्त पूजन परंपरा को जीवित रखे हुए है। बराबर पहाड़ के शिखर पर अवस्थित सिद्धेश्वरनाथ को नौ स्वयंभू नाथों में प्रथम कहा जाता है। इनकी पूजन कथा शिवभक्त वाणासुर से संबंधित होने के कारण इसे ‘वाणेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। मंदिर तक जाने के लिए सीढीयां भी बनी हुई है।


Credit- Abhishek Gaurav

बराबर पर्वत भारतवर्ष के पुरातन ऐतिहासिक पर्वतों में एक है। 1100 फुट ऊंचे बराबर पर्वत को मगध का हिमालय भी कहा जाता है। यहां सात अदभुत गुफाएं भी बनी हुई है। जिनका पता अंग्रेजों के कार्यकाल में चला । इनमें से चार गुफाएं बराबर गुफाएं एवं बाकी तीन नागार्जुन गुफाएं कहलाती है। गुफाओं में अधिकांश गुफाएं मौर्य काल से संबंध रखती हैं जोकि भारत की सबसे पुरानी काटकर बनाई गई गुफाओं में से एक हैं। पर्यटन के लिहाज से भी ये काफी उपयुक्त स्थान है। ये पर्वत सदाबहार सैरगाह के रूप में प्राचीन काल से ही चर्चित है। किंवदंतियों के अनुसार पर्वत पर बनी गुफाएं प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के ध्यान साधना लगाने हेतु सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाई गई थी। हालाकि कई गुफाओं को बौद्ध बिक्षूओं के शरण गृह के रूप में जाना जाता है. यह एक मुख्य कारण है जिसकी वजह से अधिक मात्रा में बौद्ध धर्म के मानने वाले विदेशी अनुआयी भी यहाँ आते है.


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सावन माहिने में यहां लाखों श्रधालू गण अपनी आस्था भगवान शंकर के चरणों में अर्पित करते है.बीते कुछ वर्षों से यहां कांवरियों और डाक कांवरियों की संख्या में वृद्धि हुई है, काफी अधिक कष्ट प्रद रास्तों से होते हुए भगवान भोले शंकर के कई नारों को उद्घोष करते हुए सभी रास्ते को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं.


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बिहार के फतुहा शहर के गंगा नदी में स्नान कर वहीं से पवित्र जल लेकर बराबर पर्वत के लिए सभी प्रस्थान करते हैं। नंगे पांव 90 किलोमीटर की कष्टप्रद यात्रा कई तो बिना रुके 24 घंटे के अंदर ही पूरा कर लेते हैं ऐसे श्रद्धालुओं को डाक बम कहा जाता है। इनकी दिनचर्या तो अलग ही है। यह सभी पवित्र जल लेकर सीधे चल देते हैं रात दिन चल कर बाबा सिद्धेश्वर भगवान के द्वार बराबर पर्वत पर पहुंचते हैं। रास्ते में ना रुकना ना सोना और ना ही शंका का कोई निवारण करना होता है जो भी करना है वह जल अभिषेक के बाद ही करना होता है। वहीं इन सभी के लिए मंदिर प्रांगण में खास प्रबंध होता है इन्हें बिना किसी कतार में लगे शिवलिंग पर जल अर्पण करने का मौका मिलता है, जबकि और बाकी कावड़ियों को कतार बद्ध तरीके से जल अभिषेक करने का मौका मिलता है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में ऐसे डाक कांवड़िए सावन के महीने में हर दिन रवाना होते हैं।




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वहीं बच्चें, बूढ़े, जवान और महिलाएं कंधे पर कांवर या अपने पीठ पर पवित्र जल ले कर पैरों में पड़े छालों की प्रवाह किए बगैर ऐसे ही चलते हैं जैसे मानो इन्हें यह तकलीफ नहीं देते भगवान के नाम के गुण गाते हुए, बोल बम,बोल बम का नारा है बाबा एक सहारा है, हर हर महादेव, बोला बम बोल बम जौसे  नारों का उद्घोष करते हुए बस चलते रहते हैं। हालांकि रास्ते में इनके लिए बने कई स्वयंसेवक उपचार केंद्र इन की मरहम पट्टी करते हैं, इनके लिए  और कई तरह के  प्रबंध करते हैं। इस क्रम में कई तरह की सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं, अगर कांवरिया का कोई समूह या कोई अकेला कांवरिया थक जाता है तो वह कहीं भी नहीं रुक सकता उसके लिए जगह-जगह पर  स्वच्छ स्थान लोगों के सहयोग के द्वारा बनाया जाता है, सभी वहीं पर अपना कांवर जमीन पर ना रखकर उसके  रखने के लिए बनाए गए स्थान पर ही रखते हैं , तथा उसके बाद उन्हें जो भी क्रियाकलाप करना होता है जैसे नहाना, कोई फलाहार करना तथा शंका इत्यादि के बाद उन्हें नहा कर फिर अपने कांवर को पूजा करने के बाद ही कांवर अपने कंधे पर तथा जल अपने पीठ पर लेकर वहां चलना होता हैं, वही रास्ते में आम लोग भी बोल बम के नारों के साथ  इन कावड़ियों के हौसलों को भी बुलंद करते हैं। यहां कोई धनवान या गरीब नहीं होता रास्ते में सब एक समान होते हैं बस भगवान के प्रति श्रद्धा और करुणा लिए एक दूसरे की मदद करते हैं।



                                          
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बराबर यानी वाणावर फल्गु नदी के किनारे स्थित है अतः लगभग सभी कांवरियों को नदी में घुसकर नदी  पार करना पड़ता है तथा सभी कठिनाइयों को पार करते हुए सबसे पहले कांवरिया पताल गंगा पहुंचते हैं वहां पुनः स्नान करने के बाद पर्वत की चढ़ाई शुरू करते हैं। पथरीला रास्ता मौसम की मार, कठिन और पर्वत की सीधी चढ़ाई भी इन श्रद्धालुओं के हौसले को डगमगा नहीं पाता है।

सावन के हर सोमवार  जल अभिषेक का एक अलग ही महत्व है जिसकी वजह से उस दिन मंदिर में रोजाना से अधिक भीड़ होता है।
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हालांकि यहां लाखों लोग अपने निजी वाहन तथा समाजिक वाहन के माध्यम से भी आते हैं, वही पूजा अर्चना के बाद कई लोग वही पहाड़ों और वादियों के बीच ही अपना पूरा दिन अपने परिवार सगे संबंधियों के साथ बिताते हैं।

अतः हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले सभी लोगों के लिए यह पवित्र स्थल महत्वपूर्ण महत्व रखता है। राज्य के गया शहर से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह विरासत आज भी राष्ट्रीय स्तर पर अपने ऐतिहासिक और पौराणिक विशेषताओं के बाद भी कोई खास जगह नहीं बना पाया है।



अभिषेक गौरव

Tuesday, May 12, 2020

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया।

आज देश के प्रधानमंत्री ने रात 8:00 बजे एक बार फिर अपने संबोधन में बड़े राहत पैकेज का ऐलान किया। जी हां 20 लाख करोड़ सुनने में बहुत बड़ा लगा न.. है भी...
उनके मुताबिक 2020 में 20 लाख करोड़ देश की जीडीपी के का 10% है। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस वर्ष कॉरॉना महामारी के बाद अमेरिका ने अपने कुल जीडीपी का 13%, जापान 21% स्वीडन 12%  जर्मनी 10.7 % और मलेशिया लगभग 18% का उपयोग इससे लड़ने के लिए कर रहे है। 

वहीं प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत बनाने पर बल दिया जिसमें छोटे लघु, कुटीर, उद्योगों को राहत पैकेज दिया जाएगा हालांकि अभी इस पैकेज में और क्या-क्या है इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया है। 
सोर्स- ट्विटर 

चलिए यह तो अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से थीं आज की। 
अब पिछले ढाई महीनों से जो पलायन कर रहे कामगार मजदूर वर्ग है उन पर उन्होंने कहा कि वे देश के लिए त्याग कर रहे हैं। हां त्याग, त्याग अपने जान को यूं पटरियों पर बिछाने का,  सड़क पर फर्राटे भरते गाड़ियों  से कुचल कर जान गवाने का, त्याग भूखे प्यासे दिन रात बस चलते रहने का,अपने  छोटे बच्चों के साथ ,बूढ़े मां बाप के साथ,अपने बोझे के साथ चलते रहने के साथ, उस उम्मीद का त्याग जो इन्होंने अपने केंद्र एवं राज्य सरकारों से की थी।

इस हालात को देखते हुए मुझे नक्श लायलपुरी की दो पंक्तियां याद आ रहीं है। 
ज़हर देता है कोई कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मिरा दर्द बढ़ा देता है।
सोर्स -    स्त्ट्स 
  हालात इतने खराब है कि जिन लोगों को किसी ट्रक या कोई वाहन में जगह भी मिलता है वहां उनका हाल किसी भेड़ बकरियों से कम नहीं होता, ऊपर से कई बार उन्हें पुलिस की मार भी  झेलनी पड़ती है। किसी तरह अपने राज्य, शहर, गांव पहुंच भी जाते हैं तो वहां अपने लोग भी उन्हें दोहरी नजरों से देखते हैं, उनके आंसुओं से यही लगता है कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ।


खैर यह आत्मनिर्भर भारत की ही तो पहचान है, जहां एक मां अपने छोटे-छोटे बच्चों को अपने कंधों पर लेकर चलती जा रही है घर की ओर ना जाने कितने ही मार्मिक दृश्य देखने को मिल रहे हैं इस को रोना महामारी के दौरान।  

फोर्ब्स मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार देश के 100 सबसे अधिक अमीर लोग सिर्फ मुंबई में रहते हैं जिनकी कुल संपत्ति 33 लाख करोड़ से भी अधिक है। 
जहां पूरे देश को चलाने वाला यह वर्ग उम्मीद लगाए बैठा हैं, उसे सिर्फ मायूसी मिली है और कुछ नहीं। पिछले 2 महीने से लॉक डाउन के कारण फंसे रहने के बाद उन लोगों की उम्मीद अब टूट रही है ,वे लोग बस अब घर आना चाहते हैं। जिस पीड़ा से वे लोग गुज़र रहे है शायद हमारे लिए समझना भी मुश्किल है।  अगर बात सिर्फ उत्तर प्रदेश के करे तो लगभग 20 लाख प्रवासी मजदूर राज्य से बाहर काम करते हैं, अगर उन्हें ट्रेनों से लाया जाता है तो एक ट्रेन में 1200 लोगों को अभी बैठने की सुविधा दी जा रही है इसके आधार पर 1,666 ट्रेनें लेगेंगी लाने में। 
Source- The Hindu
उद्योगों को पुनः खोलने की बात की जा रही है जहां ज्यादातर कार्यबल (मजदूर)  अपने गांवों और घरों की और जा रहे है, वहां यह काम मुश्किल नजर आ रहा है।
आज भारत की एक दर्दनाक तस्वीर जो सड़क पर है उनके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने को जरूरत है। यह दुर्भाग्य ही है, जो पूरे कार्यबल का 70% हैं वह अभी तक 
सरकार की नीतियों में अपनी जगह बनाने में नाकामयाब है। हालांकि हम उम्मीद ही कर सकते हैं की, सब कुछ जल्दी हे ठीक हो जाएगा और पुनः देश नई गति और नई ऊर्जा के साथ चलना शुरू करेगा। 

अभिषेक गौरव



Thursday, May 7, 2020

जरूर उनके पैर जादुई होंगे



रात के लगभग 2 बजने को है और मुझे नींद नहीं आ रही जब की मेरे घर समेत पूरे इलाके में घन शांति है, बस, घड़ी की टिक टिक और थोड़ा सा  खर्राटा जो मेरे पापाजी नींद में ले  रहे हैं, बस यही आवाजें मेरे कानों तक आ रही है ।

आज शाम मेरे एक पुराने दोस्त से बात हुई , आज के मौजदा पलायन करते , मजबूर मजदूरों को लेकर , उसने कितनी आसानी से कह दिया, वो लोग जान बुझ कर पैदल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर आदि जगहों से आ रहे है, लोगों में कारोना फैलने, हालाकि ये बातें आम सी लगी मुझे, क्योंकि आजकल ज्यदतार लोग ऐसे ही कहते दिखाई दे रहे है ।
सोर्स- द प्रिंट
खैर मुझे  वर्तमान देश की तस्वीर से जां निसार अख़्तर साहब की एक नज़्म याद आ रही है ,

ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है
अपने-अपने हौसले की बात है

किस अक़ीदे की दुहाई दीजिए
हर अक़ीदा आज बेऔक़ात है।   (अक़ीदा- विश्वाश)

सोर्स- इंटरनेेट 

मगर जब मैं इस शांत रात में सोचने बैठा तो, मुझे समझ नहीं आ रहा कि उन लोगों के पास जादूई पैर तो नहीं , सर पर बोझा , साथ परिवार भूखा प्यासा फिर भी चल रहे लगातार ज़रूर कोई जादूई ताकत होती होगी उनमें, हालाकि कई ऐसे भी है जो अपने गांव/ घर पहुंचने से पहले ही जान भी गवां देते है, शायद उन्हें वो जादू ठीक से नहीं आती होगी। 
सोर्स - इकोनॉमी टाइम्स 

मैं सोचता हूं.. शायद उनकी जगह अगर मुझे चलना पड़ता तो क्या होता , खैर मुझे तो एक छोटी से पहाड़ी चढ़ते हुए ही सांस फूलने लगती है, जबकि मैं जवान हूं , फिर उनके बारे में सोच के व्याकुल हो जाता हूं , छोटे छोटे बच्चे , एक मां जो अपने बच्चे को गोद में लेकर चली आ रही है, बस लोग चलते आ रहे है, शायद इस उम्मीद में कि वो अपनो के साथ   अपने आशियां में खुशी से रह सके दो वक्त की रोटी अपने तवे कि खा सके, वो शहर वाली खौफ से दूर। 

खैर , इन सब बातों से मुझे अपने मां,  पापा की वो हर साल की थका देने वाली यात्रा याद आ रही है,जो दोनों हिंदी माह सावन में सुल्तानगंज से देवघर के लिए  करते है,  लगभग 110 से 115 किमी की यात्रा नंगे पैर , पथरीले रास्ते, मौसम की मार सब झेलते हुए देवघर पर पहुंचते है।
और लाखों के कतार में अपनी आस्था भगवान शिव के चरणों में समर्पित करते है। उस दौरान भी मैं काफी परेशान रहता हू, कहा होंगे...कैसे होंगे .. दुर्र गम रास्ते.. किन विषम परिस्थितियों के साथ जद्दोजहत कर रहें होंगे। जब वे वापस आते है तो उनके पैरों में छा ले , सूजन ये आम बात हो जाती है। मै तब भी परेशान हो जाता हूं 

फिर उनके बारे में सोचता हूं , सोोर्स -  इंटरनेट

कोई 200 तो कोई 500 कुछ तो 1000 किमी कैसे चल लेते हैं। कल की कहानी होंगे ऐसे ही लोग , एक ऐसा भी समय था... जब लोग हज़ार किमी पैदल चल जाते थे, तब शायद कोई विश्वास भी न करे कि ऐसा हो भी सकता है, मगर कुछ लोग इन्हें तुच्छ नज़रों से देख रहे है, देश में कई लोग अब बस धर्म के आधार पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हें कोई बताए उन लोगों में हिंदू भी है और मुसलमां भी, बात उनकी करें जिनको जरूरत है आज हमारी। 
ख़ैर मैं अब अपने कलम को थोड़ा विराम देता हूं 2 बज कर 30 मिनट हो  गए है ।

अभिषेक गौरव

धन्यवाद 


पर्वत पर बैठे हैं महादेव

मोोर्य कालिन गुफाओं के साथ हर हर महादेव                                                                       PC - Internet हिन्दू धर्म के म...