रात के लगभग 2 बजने को है और मुझे नींद नहीं आ रही जब की मेरे घर समेत पूरे इलाके में घन शांति है, बस, घड़ी की टिक टिक और थोड़ा सा खर्राटा जो मेरे पापाजी नींद में ले रहे हैं, बस यही आवाजें मेरे कानों तक आ रही है ।
आज शाम मेरे एक पुराने दोस्त से बात हुई , आज के मौजदा पलायन करते , मजबूर मजदूरों को लेकर , उसने कितनी आसानी से कह दिया, वो लोग जान बुझ कर पैदल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर आदि जगहों से आ रहे है, लोगों में कारोना फैलने, हालाकि ये बातें आम सी लगी मुझे, क्योंकि आजकल ज्यदतार लोग ऐसे ही कहते दिखाई दे रहे है ।
सोर्स- द प्रिंट
खैर मुझे वर्तमान देश की तस्वीर से जां निसार अख़्तर साहब की एक नज़्म याद आ रही है ,
ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है
अपने-अपने हौसले की बात है
किस अक़ीदे की दुहाई दीजिए
हर अक़ीदा आज बेऔक़ात है। (अक़ीदा- विश्वाश)
मगर जब मैं इस शांत रात में सोचने बैठा तो, मुझे समझ नहीं आ रहा कि उन लोगों के पास जादूई पैर तो नहीं , सर पर बोझा , साथ परिवार भूखा प्यासा फिर भी चल रहे लगातार ज़रूर कोई जादूई ताकत होती होगी उनमें, हालाकि कई ऐसे भी है जो अपने गांव/ घर पहुंचने से पहले ही जान भी गवां देते है, शायद उन्हें वो जादू ठीक से नहीं आती होगी।
सोर्स - इकोनॉमी टाइम्स
मैं सोचता हूं.. शायद उनकी जगह अगर मुझे चलना पड़ता तो क्या होता , खैर मुझे तो एक छोटी से पहाड़ी चढ़ते हुए ही सांस फूलने लगती है, जबकि मैं जवान हूं , फिर उनके बारे में सोच के व्याकुल हो जाता हूं , छोटे छोटे बच्चे , एक मां जो अपने बच्चे को गोद में लेकर चली आ रही है, बस लोग चलते आ रहे है, शायद इस उम्मीद में कि वो अपनो के साथ अपने आशियां में खुशी से रह सके दो वक्त की रोटी अपने तवे कि खा सके, वो शहर वाली खौफ से दूर।
खैर , इन सब बातों से मुझे अपने मां, पापा की वो हर साल की थका देने वाली यात्रा याद आ रही है,जो दोनों हिंदी माह सावन में सुल्तानगंज से देवघर के लिए करते है, लगभग 110 से 115 किमी की यात्रा नंगे पैर , पथरीले रास्ते, मौसम की मार सब झेलते हुए देवघर पर पहुंचते है।
और लाखों के कतार में अपनी आस्था भगवान शिव के चरणों में समर्पित करते है। उस दौरान भी मैं काफी परेशान रहता हू, कहा होंगे...कैसे होंगे .. दुर्र गम रास्ते.. किन विषम परिस्थितियों के साथ जद्दोजहत कर रहें होंगे। जब वे वापस आते है तो उनके पैरों में छा ले , सूजन ये आम बात हो जाती है। मै तब भी परेशान हो जाता हूं
कोई 200 तो कोई 500 कुछ तो 1000 किमी कैसे चल लेते हैं। कल की कहानी होंगे ऐसे ही लोग , एक ऐसा भी समय था... जब लोग हज़ार किमी पैदल चल जाते थे, तब शायद कोई विश्वास भी न करे कि ऐसा हो भी सकता है, मगर कुछ लोग इन्हें तुच्छ नज़रों से देख रहे है, देश में कई लोग अब बस धर्म के आधार पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हें कोई बताए उन लोगों में हिंदू भी है और मुसलमां भी, बात उनकी करें जिनको जरूरत है आज हमारी।
ख़ैर मैं अब अपने कलम को थोड़ा विराम देता हूं 2 बज कर 30 मिनट हो गए है ।
अभिषेक गौरव
धन्यवाद
ये विडम्बना है कि यही प्रवासी मजदूर हमारे देश की workforce की 70 प्रतिशत हैं और अब तक सभी सरकार की नीतियों में इन्हें हमेशा दर किनार किया गया है। उम्मीद करते हैं कि इस महामारी के कारण ये invisible workforce जो की अब visible हैं, सरकार भी अपनी नीतियों में उनकी मौजूदगी दर्ज कराये आने वाले समय में ।
ReplyDeleteबहुत बढ़िया विचार। ����
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