Friday, April 24, 2020

हिंदू चला गया न मुसलां चला गया

"देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान 
कितना बदल गया इंसान"

पूरे विश्व के ज्यदातर देश समेत भारत में भी कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन है। जहां एक ओर पूरा देश अपने घरों में रहने को मजबूर है तो वहीं कुछ लोग अपराधिक गतिविधियों में भी संलिप्त है।अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक बड़ी अपराधिक घटना को अंजाम दिया गया, जिसमें 100 से ज्यादा लोगों की भूमिका रही। जी हां वर्तमान के सबसे चर्चित घटना जिसमें भीड़ ने पीट- पिट कर तीन व्यक्तियों की जान ले ली थी।, वहीं इस मामले को कुछ मीडिया समेत सोशल मीडिया में कुछ लोग सांप्रदायिक रंग देने में लगे हैं, जी हा वजह ये की तीन में से दो हिंदू धर्म के संत तथा एक उनका ड्राइवर था । मगर जिस तरह से कुछ लोग इस खबर को दिखा रहे  तथा जो लोग संवेदना व्यक्त कर रहे हैं जिससे यही लग रहा है कि मरने वाले सिर्फ दो लोग ही है। इंसान को इंसान से नहीं उनके ओहदे और धर्म से देखा जा रहा है।

खैर  घटना 16 अप्रैल की रात  पालघर की 
है जहां  सैकड़ों लोगों की भीड़ ने तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस घटना में सुशील गिरि महाराज (30) एवं महाराज कल्पवृक्ष गिरि (70) जूना अखाड़ा से संबंधित थे, साथ में इनका कार चालक भी इस घटना का शिकार हो गया। ये लोग कार से सूरत किसी की अंत्‍येष्टि में शामिल होने जा रहे थे कि तभी पालघर में 100 से अधिक लोगों की भीड़ इन तीनों पर टूट पड़ी और इतना पीटा की तीनों की मौत हो गयी। मौके पर मौजूद पुलिस ने बताया की लोगों की संख्‍या इतनी अधिक थी की हम इन्‍हें बचाने में असफल रहे।  हालाकि घटना की वीडियो आने के बाद पुलिस प्रशासन पर भी कई सवाल उठ रहे है, क्युकी वीडियो में दिख रहे पुलिस कर्मी उनलोगों को बचाने का प्रयास भी नहीं करती दिख रही है। हालाकि ये जांच का विषय है और इस पूरे मामले में 101 लोगों को  गिरफ्तार भी कर लिया गया है और उन पुलिसकर्मियों पर भी कार्यवाही जारी है। हालाकि मामले को सरकार ने CID को सौंप दी है।

ये घटना जितनी निंदनीय उतनी ही निंदनीय उसे संप्रदायिक रंग देना है। इस घटना के बाद जिस तरह एक खास समुदाय को लगातार निशाना बनाया जा रहा है उससे पूरे देश की शांति और सौहार्द को बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो चुका है।

जिस तरह नफ़रत की राजनीति की जा रही है उससे , अनपढ़, कम पढ़े लिखे और पढ़े लिखे लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। आज लोगों के बीच एक दूसरे के धर्म के को लेकर द्वेष घृणा पैदा हो रहा है। आज लोग अपने पड़ोसी ,अपने मित्र अथवा ऐसा कोई भी दूसरी धर्म से आता है उन सभी से विश्वास उठता जा रहा है। और इसके  काफी दूरगामी परिणाम होंगे। जो लोग मोबाइल फोन के पीछे बैठकर नफरत फैला रहे हैं उनका तो कम नुकसान होगा परंतु वैसे मासूम लोग जिन्होंने कभी भी दूसरों के प्रति नफरत और घृणा की नजरों से नहीं देखा करते है, वह भी इस खास तरह के फैलाए जा रहे एजेंडा में शामिल हो जाएंगे और यह बेहद दुखद है।

आज हम इंसान को इंसान नहीं बल्कि उनकी जाति या धर्म से ही पहचाने लगे हैं। अगर यह सब ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ बिखर जाएगा और बस नफरत का राज होगा।

आज जहां हर तरफ लोग कोरोना वायरस से मर रहे हैं वहां भारत में सिर्फ  मजहबी खेल चल रहा है।।
इन सब दृश्यों को देखते हुए मुझे 'मजाज लखनवी' की 2 लाइनें याद आ रही हैं...

"हिंदू चला गया ना मुसलमां गया,
   इंसा की जुस्तजू में इंसा चला गया"
इन दो पंक्तियों में बहुत कुछ छुपा है, जिस तरह से आज लोगों की मौत इस महामारी से हो रही है, उसके बाद लोगों की अंतिम संस्कार भी सही तरीके से नहीं हो पा रहा, जितनी भी नफरत, घृणा , विश्वासघात सारी नकारात्मक चीजें इस  जहां की मिट्टी या आग में चल कर राख हो जाएगा।

अंत में दो लाइने और याद आ रहीं है, चरण सिंह बशर साहब की , की उन्होंने कहा था कि ..

"यह दुनिया नफरतों के आखिरी स्टेज पर है
इलाज इसका मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है"


Abhishek Gaurav


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