क्या करू अब मीठा भी तीखा सा लगता है
अब भी तलब होती है पानी की ,मगर क्या करू अब ये भी फिका सा लगता है। शाम का इंतजार अब करता नहीं शौक से,
पता नहीं क्यों अब शाम भी दोपहर सा लगता हैं।
आजकल कलम की जरूरत लगती नहीं मुझे, पता नहीं क्यों, उंगलियों के तल्ले ही अब दबात से लगते है.
अब भी ललक होती है सुबह की, मगर क्या करू अब सुबह भी वीरान सा लगता है । दूर कहीं टोपी वाले को देखता हूं, मंदिर निहारते हुए, ना जाने क्यों अब भी वह कलाम सा लगता है। देखता हू शहर के बड़े दरख़्तो के नीचे, छोटे पौधों को तड़पते हुए,तो आज भी शहर मुझे शमशान सा लगता है। क्या करू अब मीठा भी, तीखा सा लगता है ।
अभिषेक गौरव
Sunday, October 27, 2019
मीठा भी तीखा सा लगता है
Saturday, October 12, 2019
बोझ
अब. मैं रोज़ झुक कर चलता हूं,
क्या बताऊं थोड़ा रुक कर चलता हूं,
देखा है मैंने दादाजी को ऐसे चलते हूए
ना जाने मैं ऐसे क्यों चलता हूं।
कहते है, बुढ़ापा भी बचपना सा होता है,
मगर किसी ने बताया नहीं, बचपना भी बुढ़ापा सा होता है!
उम्र की शुरुआत में ना जाने क्यों इतना बोझ है
बस लोग यूं ही कहते है,बस तुम्हारी ही तो मौज है ।
यू घर से जब निकलता हूं,कुछ दूर चलता हूं
तो बस यही सोचता हूं, बस्ते में किताबों के आलावा कितना कुछ और है, नन्हा सा जान हूं ,
ना जाने कितनों के सपनों का पहचान हू।
ना जाने लोग मुझे, क्या क्या बनाना चाहते हैं
दूसरों का चेहरा दिखा कर, दो - चार किताबें और लादना चाहते है, अपने उम्मीदों के आसमान में बेड़ियों से बांध कर उड़ाना चाहते है, अगर चल ना पाऊं तो बैसाखी थमा देना चाहते हैं।
ऐसे तो मैं थक जाऊंगा, चुप रहते रहते बहक जाऊंगा,
कैसे बताऊं की मै क्या चाहता हूं, बस अपने सपनों का आकार चाहता हूं, बिना बोझ के एक खुली उड़ान चाहता हूं
बस अपनी आंखों में खुद के लिए सम्मान चाहता हूं।
मगर अब मैं रोज़ झुक कर चलता हूं,
क्या बताऊं थोड़ा रुक कर चलता हूं।
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