आज देश के प्रधानमंत्री ने रात 8:00 बजे एक बार फिर अपने संबोधन में बड़े राहत पैकेज का ऐलान किया। जी हां 20 लाख करोड़ सुनने में बहुत बड़ा लगा न.. है भी...
उनके मुताबिक 2020 में 20 लाख करोड़ देश की जीडीपी के का 10% है। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस वर्ष कॉरॉना महामारी के बाद अमेरिका ने अपने कुल जीडीपी का 13%, जापान 21% स्वीडन 12% जर्मनी 10.7 % और मलेशिया लगभग 18% का उपयोग इससे लड़ने के लिए कर रहे है।
वहीं प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत बनाने पर बल दिया जिसमें छोटे लघु, कुटीर, उद्योगों को राहत पैकेज दिया जाएगा हालांकि अभी इस पैकेज में और क्या-क्या है इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया है।
चलिए यह तो अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से थीं आज की।
अब पिछले ढाई महीनों से जो पलायन कर रहे कामगार मजदूर वर्ग है उन पर उन्होंने कहा कि वे देश के लिए त्याग कर रहे हैं। हां त्याग, त्याग अपने जान को यूं पटरियों पर बिछाने का, सड़क पर फर्राटे भरते गाड़ियों से कुचल कर जान गवाने का, त्याग भूखे प्यासे दिन रात बस चलते रहने का,अपने छोटे बच्चों के साथ ,बूढ़े मां बाप के साथ,अपने बोझे के साथ चलते रहने के साथ, उस उम्मीद का त्याग जो इन्होंने अपने केंद्र एवं राज्य सरकारों से की थी।
इस हालात को देखते हुए मुझे नक्श लायलपुरी की दो पंक्तियां याद आ रहीं है।
ज़हर देता है कोई कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मिरा दर्द बढ़ा देता है।
सोर्स - स्त्ट्स
हालात इतने खराब है कि जिन लोगों को किसी ट्रक या कोई वाहन में जगह भी मिलता है वहां उनका हाल किसी भेड़ बकरियों से कम नहीं होता, ऊपर से कई बार उन्हें पुलिस की मार भी झेलनी पड़ती है। किसी तरह अपने राज्य, शहर, गांव पहुंच भी जाते हैं तो वहां अपने लोग भी उन्हें दोहरी नजरों से देखते हैं, उनके आंसुओं से यही लगता है कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ।
खैर यह आत्मनिर्भर भारत की ही तो पहचान है, जहां एक मां अपने छोटे-छोटे बच्चों को अपने कंधों पर लेकर चलती जा रही है घर की ओर ना जाने कितने ही मार्मिक दृश्य देखने को मिल रहे हैं इस को रोना महामारी के दौरान।
फोर्ब्स मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार देश के 100 सबसे अधिक अमीर लोग सिर्फ मुंबई में रहते हैं जिनकी कुल संपत्ति 33 लाख करोड़ से भी अधिक है।
जहां पूरे देश को चलाने वाला यह वर्ग उम्मीद लगाए बैठा हैं, उसे सिर्फ मायूसी मिली है और कुछ नहीं। पिछले 2 महीने से लॉक डाउन के कारण फंसे रहने के बाद उन लोगों की उम्मीद अब टूट रही है ,वे लोग बस अब घर आना चाहते हैं। जिस पीड़ा से वे लोग गुज़र रहे है शायद हमारे लिए समझना भी मुश्किल है। अगर बात सिर्फ उत्तर प्रदेश के करे तो लगभग 20 लाख प्रवासी मजदूर राज्य से बाहर काम करते हैं, अगर उन्हें ट्रेनों से लाया जाता है तो एक ट्रेन में 1200 लोगों को अभी बैठने की सुविधा दी जा रही है इसके आधार पर 1,666 ट्रेनें लेगेंगी लाने में।
Source- The Hindu
उद्योगों को पुनः खोलने की बात की जा रही है जहां ज्यादातर कार्यबल (मजदूर) अपने गांवों और घरों की और जा रहे है, वहां यह काम मुश्किल नजर आ रहा है।
आज भारत की एक दर्दनाक तस्वीर जो सड़क पर है उनके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने को जरूरत है। यह दुर्भाग्य ही है, जो पूरे कार्यबल का 70% हैं वह अभी तक
सरकार की नीतियों में अपनी जगह बनाने में नाकामयाब है। हालांकि हम उम्मीद ही कर सकते हैं की, सब कुछ जल्दी हे ठीक हो जाएगा और पुनः देश नई गति और नई ऊर्जा के साथ चलना शुरू करेगा।
अभिषेक गौरव