Tuesday, May 26, 2020

पर्वत पर बैठे हैं महादेव

मोोर्य कालिन गुफाओं के साथ हर हर महादेव


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हिन्दू धर्म के मान्यताओं के अनुसार श्रावण माह को बेहद पवित्र माना जाता है, इस पूरे महिने में भगवान शंकर  कि पुजा- अर्चना  भारत समेत विश्व के विभिन्न  क्षेत्रों में बड़े धूम धाम से की जाती है. इस माह में कई स्थानों पर श्रावणी मेले का आयोजन किया जाता है. उन्ही में से बिहार राज्य के जहानाबाद जिले में स्थित बराबर  जहाँ पर हर वर्ष लगने वाला श्रावणी मेला पर्यटकों अथवा श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है.  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव यहां पौराणिक पर्वत पर बाबा सिद्धेश्वर नाथ के रूप में विराजमान है. जिनके दर्शन के लिए लोग देश विदेश से आते है,  बराबर को ‘बाणावर’ भी कहा जाता है. महाभारत कालीन जीवंत कृतियों में से एक यह मंदिर आज भी पुरातन शिल्पकृतियों में महिमामंडित प्राचीन आदर्शों से युक्त पूजन परंपरा को जीवित रखे हुए है। बराबर पहाड़ के शिखर पर अवस्थित सिद्धेश्वरनाथ को नौ स्वयंभू नाथों में प्रथम कहा जाता है। इनकी पूजन कथा शिवभक्त वाणासुर से संबंधित होने के कारण इसे ‘वाणेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। मंदिर तक जाने के लिए सीढीयां भी बनी हुई है।


Credit- Abhishek Gaurav

बराबर पर्वत भारतवर्ष के पुरातन ऐतिहासिक पर्वतों में एक है। 1100 फुट ऊंचे बराबर पर्वत को मगध का हिमालय भी कहा जाता है। यहां सात अदभुत गुफाएं भी बनी हुई है। जिनका पता अंग्रेजों के कार्यकाल में चला । इनमें से चार गुफाएं बराबर गुफाएं एवं बाकी तीन नागार्जुन गुफाएं कहलाती है। गुफाओं में अधिकांश गुफाएं मौर्य काल से संबंध रखती हैं जोकि भारत की सबसे पुरानी काटकर बनाई गई गुफाओं में से एक हैं। पर्यटन के लिहाज से भी ये काफी उपयुक्त स्थान है। ये पर्वत सदाबहार सैरगाह के रूप में प्राचीन काल से ही चर्चित है। किंवदंतियों के अनुसार पर्वत पर बनी गुफाएं प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों के ध्यान साधना लगाने हेतु सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाई गई थी। हालाकि कई गुफाओं को बौद्ध बिक्षूओं के शरण गृह के रूप में जाना जाता है. यह एक मुख्य कारण है जिसकी वजह से अधिक मात्रा में बौद्ध धर्म के मानने वाले विदेशी अनुआयी भी यहाँ आते है.


PC- Abhishek Gaurav
 

सावन माहिने में यहां लाखों श्रधालू गण अपनी आस्था भगवान शंकर के चरणों में अर्पित करते है.बीते कुछ वर्षों से यहां कांवरियों और डाक कांवरियों की संख्या में वृद्धि हुई है, काफी अधिक कष्ट प्रद रास्तों से होते हुए भगवान भोले शंकर के कई नारों को उद्घोष करते हुए सभी रास्ते को सफलतापूर्वक पूरा कर लेते हैं.


PC - Abhishek Gaurav
 

बिहार के फतुहा शहर के गंगा नदी में स्नान कर वहीं से पवित्र जल लेकर बराबर पर्वत के लिए सभी प्रस्थान करते हैं। नंगे पांव 90 किलोमीटर की कष्टप्रद यात्रा कई तो बिना रुके 24 घंटे के अंदर ही पूरा कर लेते हैं ऐसे श्रद्धालुओं को डाक बम कहा जाता है। इनकी दिनचर्या तो अलग ही है। यह सभी पवित्र जल लेकर सीधे चल देते हैं रात दिन चल कर बाबा सिद्धेश्वर भगवान के द्वार बराबर पर्वत पर पहुंचते हैं। रास्ते में ना रुकना ना सोना और ना ही शंका का कोई निवारण करना होता है जो भी करना है वह जल अभिषेक के बाद ही करना होता है। वहीं इन सभी के लिए मंदिर प्रांगण में खास प्रबंध होता है इन्हें बिना किसी कतार में लगे शिवलिंग पर जल अर्पण करने का मौका मिलता है, जबकि और बाकी कावड़ियों को कतार बद्ध तरीके से जल अभिषेक करने का मौका मिलता है। रोजाना सैकड़ों की संख्या में ऐसे डाक कांवड़िए सावन के महीने में हर दिन रवाना होते हैं।




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वहीं बच्चें, बूढ़े, जवान और महिलाएं कंधे पर कांवर या अपने पीठ पर पवित्र जल ले कर पैरों में पड़े छालों की प्रवाह किए बगैर ऐसे ही चलते हैं जैसे मानो इन्हें यह तकलीफ नहीं देते भगवान के नाम के गुण गाते हुए, बोल बम,बोल बम का नारा है बाबा एक सहारा है, हर हर महादेव, बोला बम बोल बम जौसे  नारों का उद्घोष करते हुए बस चलते रहते हैं। हालांकि रास्ते में इनके लिए बने कई स्वयंसेवक उपचार केंद्र इन की मरहम पट्टी करते हैं, इनके लिए  और कई तरह के  प्रबंध करते हैं। इस क्रम में कई तरह की सावधानियां भी बरतनी पड़ती हैं, अगर कांवरिया का कोई समूह या कोई अकेला कांवरिया थक जाता है तो वह कहीं भी नहीं रुक सकता उसके लिए जगह-जगह पर  स्वच्छ स्थान लोगों के सहयोग के द्वारा बनाया जाता है, सभी वहीं पर अपना कांवर जमीन पर ना रखकर उसके  रखने के लिए बनाए गए स्थान पर ही रखते हैं , तथा उसके बाद उन्हें जो भी क्रियाकलाप करना होता है जैसे नहाना, कोई फलाहार करना तथा शंका इत्यादि के बाद उन्हें नहा कर फिर अपने कांवर को पूजा करने के बाद ही कांवर अपने कंधे पर तथा जल अपने पीठ पर लेकर वहां चलना होता हैं, वही रास्ते में आम लोग भी बोल बम के नारों के साथ  इन कावड़ियों के हौसलों को भी बुलंद करते हैं। यहां कोई धनवान या गरीब नहीं होता रास्ते में सब एक समान होते हैं बस भगवान के प्रति श्रद्धा और करुणा लिए एक दूसरे की मदद करते हैं।



                                          
PC- Abhishek Gaurav

 

बराबर यानी वाणावर फल्गु नदी के किनारे स्थित है अतः लगभग सभी कांवरियों को नदी में घुसकर नदी  पार करना पड़ता है तथा सभी कठिनाइयों को पार करते हुए सबसे पहले कांवरिया पताल गंगा पहुंचते हैं वहां पुनः स्नान करने के बाद पर्वत की चढ़ाई शुरू करते हैं। पथरीला रास्ता मौसम की मार, कठिन और पर्वत की सीधी चढ़ाई भी इन श्रद्धालुओं के हौसले को डगमगा नहीं पाता है।

सावन के हर सोमवार  जल अभिषेक का एक अलग ही महत्व है जिसकी वजह से उस दिन मंदिर में रोजाना से अधिक भीड़ होता है।
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हालांकि यहां लाखों लोग अपने निजी वाहन तथा समाजिक वाहन के माध्यम से भी आते हैं, वही पूजा अर्चना के बाद कई लोग वही पहाड़ों और वादियों के बीच ही अपना पूरा दिन अपने परिवार सगे संबंधियों के साथ बिताते हैं।

अतः हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले सभी लोगों के लिए यह पवित्र स्थल महत्वपूर्ण महत्व रखता है। राज्य के गया शहर से 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह विरासत आज भी राष्ट्रीय स्तर पर अपने ऐतिहासिक और पौराणिक विशेषताओं के बाद भी कोई खास जगह नहीं बना पाया है।



अभिषेक गौरव

Tuesday, May 12, 2020

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया।

आज देश के प्रधानमंत्री ने रात 8:00 बजे एक बार फिर अपने संबोधन में बड़े राहत पैकेज का ऐलान किया। जी हां 20 लाख करोड़ सुनने में बहुत बड़ा लगा न.. है भी...
उनके मुताबिक 2020 में 20 लाख करोड़ देश की जीडीपी के का 10% है। हालांकि मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस वर्ष कॉरॉना महामारी के बाद अमेरिका ने अपने कुल जीडीपी का 13%, जापान 21% स्वीडन 12%  जर्मनी 10.7 % और मलेशिया लगभग 18% का उपयोग इससे लड़ने के लिए कर रहे है। 

वहीं प्रधानमंत्री ने आत्मनिर्भर भारत बनाने पर बल दिया जिसमें छोटे लघु, कुटीर, उद्योगों को राहत पैकेज दिया जाएगा हालांकि अभी इस पैकेज में और क्या-क्या है इसका खुलासा उन्होंने नहीं किया है। 
सोर्स- ट्विटर 

चलिए यह तो अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से थीं आज की। 
अब पिछले ढाई महीनों से जो पलायन कर रहे कामगार मजदूर वर्ग है उन पर उन्होंने कहा कि वे देश के लिए त्याग कर रहे हैं। हां त्याग, त्याग अपने जान को यूं पटरियों पर बिछाने का,  सड़क पर फर्राटे भरते गाड़ियों  से कुचल कर जान गवाने का, त्याग भूखे प्यासे दिन रात बस चलते रहने का,अपने  छोटे बच्चों के साथ ,बूढ़े मां बाप के साथ,अपने बोझे के साथ चलते रहने के साथ, उस उम्मीद का त्याग जो इन्होंने अपने केंद्र एवं राज्य सरकारों से की थी।

इस हालात को देखते हुए मुझे नक्श लायलपुरी की दो पंक्तियां याद आ रहीं है। 
ज़हर देता है कोई कोई दवा देता है
जो भी मिलता है मिरा दर्द बढ़ा देता है।
सोर्स -    स्त्ट्स 
  हालात इतने खराब है कि जिन लोगों को किसी ट्रक या कोई वाहन में जगह भी मिलता है वहां उनका हाल किसी भेड़ बकरियों से कम नहीं होता, ऊपर से कई बार उन्हें पुलिस की मार भी  झेलनी पड़ती है। किसी तरह अपने राज्य, शहर, गांव पहुंच भी जाते हैं तो वहां अपने लोग भी उन्हें दोहरी नजरों से देखते हैं, उनके आंसुओं से यही लगता है कि कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ।


खैर यह आत्मनिर्भर भारत की ही तो पहचान है, जहां एक मां अपने छोटे-छोटे बच्चों को अपने कंधों पर लेकर चलती जा रही है घर की ओर ना जाने कितने ही मार्मिक दृश्य देखने को मिल रहे हैं इस को रोना महामारी के दौरान।  

फोर्ब्स मैगज़ीन की रिपोर्ट के अनुसार देश के 100 सबसे अधिक अमीर लोग सिर्फ मुंबई में रहते हैं जिनकी कुल संपत्ति 33 लाख करोड़ से भी अधिक है। 
जहां पूरे देश को चलाने वाला यह वर्ग उम्मीद लगाए बैठा हैं, उसे सिर्फ मायूसी मिली है और कुछ नहीं। पिछले 2 महीने से लॉक डाउन के कारण फंसे रहने के बाद उन लोगों की उम्मीद अब टूट रही है ,वे लोग बस अब घर आना चाहते हैं। जिस पीड़ा से वे लोग गुज़र रहे है शायद हमारे लिए समझना भी मुश्किल है।  अगर बात सिर्फ उत्तर प्रदेश के करे तो लगभग 20 लाख प्रवासी मजदूर राज्य से बाहर काम करते हैं, अगर उन्हें ट्रेनों से लाया जाता है तो एक ट्रेन में 1200 लोगों को अभी बैठने की सुविधा दी जा रही है इसके आधार पर 1,666 ट्रेनें लेगेंगी लाने में। 
Source- The Hindu
उद्योगों को पुनः खोलने की बात की जा रही है जहां ज्यादातर कार्यबल (मजदूर)  अपने गांवों और घरों की और जा रहे है, वहां यह काम मुश्किल नजर आ रहा है।
आज भारत की एक दर्दनाक तस्वीर जो सड़क पर है उनके लिए सरकार को ठोस कदम उठाने को जरूरत है। यह दुर्भाग्य ही है, जो पूरे कार्यबल का 70% हैं वह अभी तक 
सरकार की नीतियों में अपनी जगह बनाने में नाकामयाब है। हालांकि हम उम्मीद ही कर सकते हैं की, सब कुछ जल्दी हे ठीक हो जाएगा और पुनः देश नई गति और नई ऊर्जा के साथ चलना शुरू करेगा। 

अभिषेक गौरव



Thursday, May 7, 2020

जरूर उनके पैर जादुई होंगे



रात के लगभग 2 बजने को है और मुझे नींद नहीं आ रही जब की मेरे घर समेत पूरे इलाके में घन शांति है, बस, घड़ी की टिक टिक और थोड़ा सा  खर्राटा जो मेरे पापाजी नींद में ले  रहे हैं, बस यही आवाजें मेरे कानों तक आ रही है ।

आज शाम मेरे एक पुराने दोस्त से बात हुई , आज के मौजदा पलायन करते , मजबूर मजदूरों को लेकर , उसने कितनी आसानी से कह दिया, वो लोग जान बुझ कर पैदल दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर आदि जगहों से आ रहे है, लोगों में कारोना फैलने, हालाकि ये बातें आम सी लगी मुझे, क्योंकि आजकल ज्यदतार लोग ऐसे ही कहते दिखाई दे रहे है ।
सोर्स- द प्रिंट
खैर मुझे  वर्तमान देश की तस्वीर से जां निसार अख़्तर साहब की एक नज़्म याद आ रही है ,

ज़िन्दगी तनहा सफ़र की रात है
अपने-अपने हौसले की बात है

किस अक़ीदे की दुहाई दीजिए
हर अक़ीदा आज बेऔक़ात है।   (अक़ीदा- विश्वाश)

सोर्स- इंटरनेेट 

मगर जब मैं इस शांत रात में सोचने बैठा तो, मुझे समझ नहीं आ रहा कि उन लोगों के पास जादूई पैर तो नहीं , सर पर बोझा , साथ परिवार भूखा प्यासा फिर भी चल रहे लगातार ज़रूर कोई जादूई ताकत होती होगी उनमें, हालाकि कई ऐसे भी है जो अपने गांव/ घर पहुंचने से पहले ही जान भी गवां देते है, शायद उन्हें वो जादू ठीक से नहीं आती होगी। 
सोर्स - इकोनॉमी टाइम्स 

मैं सोचता हूं.. शायद उनकी जगह अगर मुझे चलना पड़ता तो क्या होता , खैर मुझे तो एक छोटी से पहाड़ी चढ़ते हुए ही सांस फूलने लगती है, जबकि मैं जवान हूं , फिर उनके बारे में सोच के व्याकुल हो जाता हूं , छोटे छोटे बच्चे , एक मां जो अपने बच्चे को गोद में लेकर चली आ रही है, बस लोग चलते आ रहे है, शायद इस उम्मीद में कि वो अपनो के साथ   अपने आशियां में खुशी से रह सके दो वक्त की रोटी अपने तवे कि खा सके, वो शहर वाली खौफ से दूर। 

खैर , इन सब बातों से मुझे अपने मां,  पापा की वो हर साल की थका देने वाली यात्रा याद आ रही है,जो दोनों हिंदी माह सावन में सुल्तानगंज से देवघर के लिए  करते है,  लगभग 110 से 115 किमी की यात्रा नंगे पैर , पथरीले रास्ते, मौसम की मार सब झेलते हुए देवघर पर पहुंचते है।
और लाखों के कतार में अपनी आस्था भगवान शिव के चरणों में समर्पित करते है। उस दौरान भी मैं काफी परेशान रहता हू, कहा होंगे...कैसे होंगे .. दुर्र गम रास्ते.. किन विषम परिस्थितियों के साथ जद्दोजहत कर रहें होंगे। जब वे वापस आते है तो उनके पैरों में छा ले , सूजन ये आम बात हो जाती है। मै तब भी परेशान हो जाता हूं 

फिर उनके बारे में सोचता हूं , सोोर्स -  इंटरनेट

कोई 200 तो कोई 500 कुछ तो 1000 किमी कैसे चल लेते हैं। कल की कहानी होंगे ऐसे ही लोग , एक ऐसा भी समय था... जब लोग हज़ार किमी पैदल चल जाते थे, तब शायद कोई विश्वास भी न करे कि ऐसा हो भी सकता है, मगर कुछ लोग इन्हें तुच्छ नज़रों से देख रहे है, देश में कई लोग अब बस धर्म के आधार पर राजनीति कर रहे हैं, उन्हें कोई बताए उन लोगों में हिंदू भी है और मुसलमां भी, बात उनकी करें जिनको जरूरत है आज हमारी। 
ख़ैर मैं अब अपने कलम को थोड़ा विराम देता हूं 2 बज कर 30 मिनट हो  गए है ।

अभिषेक गौरव

धन्यवाद 


Friday, April 24, 2020

हिंदू चला गया न मुसलां चला गया

"देख तेरे इंसान की हालत क्या हो गई भगवान 
कितना बदल गया इंसान"

पूरे विश्व के ज्यदातर देश समेत भारत में भी कोरोना वायरस के कारण लॉकडाउन है। जहां एक ओर पूरा देश अपने घरों में रहने को मजबूर है तो वहीं कुछ लोग अपराधिक गतिविधियों में भी संलिप्त है।अभी कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के पालघर जिले में एक बड़ी अपराधिक घटना को अंजाम दिया गया, जिसमें 100 से ज्यादा लोगों की भूमिका रही। जी हां वर्तमान के सबसे चर्चित घटना जिसमें भीड़ ने पीट- पिट कर तीन व्यक्तियों की जान ले ली थी।, वहीं इस मामले को कुछ मीडिया समेत सोशल मीडिया में कुछ लोग सांप्रदायिक रंग देने में लगे हैं, जी हा वजह ये की तीन में से दो हिंदू धर्म के संत तथा एक उनका ड्राइवर था । मगर जिस तरह से कुछ लोग इस खबर को दिखा रहे  तथा जो लोग संवेदना व्यक्त कर रहे हैं जिससे यही लग रहा है कि मरने वाले सिर्फ दो लोग ही है। इंसान को इंसान से नहीं उनके ओहदे और धर्म से देखा जा रहा है।

खैर  घटना 16 अप्रैल की रात  पालघर की 
है जहां  सैकड़ों लोगों की भीड़ ने तीन लोगों की पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस घटना में सुशील गिरि महाराज (30) एवं महाराज कल्पवृक्ष गिरि (70) जूना अखाड़ा से संबंधित थे, साथ में इनका कार चालक भी इस घटना का शिकार हो गया। ये लोग कार से सूरत किसी की अंत्‍येष्टि में शामिल होने जा रहे थे कि तभी पालघर में 100 से अधिक लोगों की भीड़ इन तीनों पर टूट पड़ी और इतना पीटा की तीनों की मौत हो गयी। मौके पर मौजूद पुलिस ने बताया की लोगों की संख्‍या इतनी अधिक थी की हम इन्‍हें बचाने में असफल रहे।  हालाकि घटना की वीडियो आने के बाद पुलिस प्रशासन पर भी कई सवाल उठ रहे है, क्युकी वीडियो में दिख रहे पुलिस कर्मी उनलोगों को बचाने का प्रयास भी नहीं करती दिख रही है। हालाकि ये जांच का विषय है और इस पूरे मामले में 101 लोगों को  गिरफ्तार भी कर लिया गया है और उन पुलिसकर्मियों पर भी कार्यवाही जारी है। हालाकि मामले को सरकार ने CID को सौंप दी है।

ये घटना जितनी निंदनीय उतनी ही निंदनीय उसे संप्रदायिक रंग देना है। इस घटना के बाद जिस तरह एक खास समुदाय को लगातार निशाना बनाया जा रहा है उससे पूरे देश की शांति और सौहार्द को बिगड़ने का खतरा उत्पन्न हो चुका है।

जिस तरह नफ़रत की राजनीति की जा रही है उससे , अनपढ़, कम पढ़े लिखे और पढ़े लिखे लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। आज लोगों के बीच एक दूसरे के धर्म के को लेकर द्वेष घृणा पैदा हो रहा है। आज लोग अपने पड़ोसी ,अपने मित्र अथवा ऐसा कोई भी दूसरी धर्म से आता है उन सभी से विश्वास उठता जा रहा है। और इसके  काफी दूरगामी परिणाम होंगे। जो लोग मोबाइल फोन के पीछे बैठकर नफरत फैला रहे हैं उनका तो कम नुकसान होगा परंतु वैसे मासूम लोग जिन्होंने कभी भी दूसरों के प्रति नफरत और घृणा की नजरों से नहीं देखा करते है, वह भी इस खास तरह के फैलाए जा रहे एजेंडा में शामिल हो जाएंगे और यह बेहद दुखद है।

आज हम इंसान को इंसान नहीं बल्कि उनकी जाति या धर्म से ही पहचाने लगे हैं। अगर यह सब ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सब कुछ बिखर जाएगा और बस नफरत का राज होगा।

आज जहां हर तरफ लोग कोरोना वायरस से मर रहे हैं वहां भारत में सिर्फ  मजहबी खेल चल रहा है।।
इन सब दृश्यों को देखते हुए मुझे 'मजाज लखनवी' की 2 लाइनें याद आ रही हैं...

"हिंदू चला गया ना मुसलमां गया,
   इंसा की जुस्तजू में इंसा चला गया"
इन दो पंक्तियों में बहुत कुछ छुपा है, जिस तरह से आज लोगों की मौत इस महामारी से हो रही है, उसके बाद लोगों की अंतिम संस्कार भी सही तरीके से नहीं हो पा रहा, जितनी भी नफरत, घृणा , विश्वासघात सारी नकारात्मक चीजें इस  जहां की मिट्टी या आग में चल कर राख हो जाएगा।

अंत में दो लाइने और याद आ रहीं है, चरण सिंह बशर साहब की , की उन्होंने कहा था कि ..

"यह दुनिया नफरतों के आखिरी स्टेज पर है
इलाज इसका मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं है"


Abhishek Gaurav


Tuesday, March 31, 2020

बीमारी से पहले भूख से मर जाने का डर

पूर्ण बंदी का सातवां दिन पूरा होने को है लोग अपने - अपने तरीके से  समय गुजार रहे है। वही इंटरनेट लोगों का सहारा बन गया है, लोग सोशल मीडिया पर  अपने अपने विचार प्रकट एवं  साझा कर रहे है कोई अपने डांस के विडियोज ,मजाकिया विडियोज ऐसे ही कई और अपने किसी कला को लोगो के साथ साझा कर रहे है। मगर इन सबों के बीच सबसे मशहूर कुछ हो रहा है तो आम लोगो को पुलिस के द्वारा पिटा जाने का वीडियो लोग खूब जम के शेयर अथवा लाईक कर रहे है । भारी मांग के बाद दूरदर्शन पर शुरु हुए (हालाकि जब लाखों लोग सड़क पर भूखे और सहमे पैदल चल रहे है वहीं ये मांग कौन सी जनता ने की उनका पता नहीं चला है अभी तक) रामायण और महाभारत भी इतना नहीं देखा जा रहा जितना लोग पिटाई के विडियोज का लुफ्त उठा रहे है । अब यह कितना सही या गलत है इन सब को छोर कर भी देखे तो हमे ये सोचने की जरूरत है कि हमे हिंसा इतना क्यों पसंद आ रहा है । जो लाठियां आम लोगो पर बरस रहीं है उसका दर्द केवल वही समझ पा रहे है । क्या हम सभी इतने संवेदनहीन हो गए की किसी का दर्द भी हमारे मनोरंजन का साधन बन जाए ?

 संक्रमण को रोकने के लिए लगाई गई पूर्ण बंदी के बाबजूद गरीबी और लाचारी से महानगरों से पलायन कर रहे लोग दिहाड़ी मजदूर, सड़कों के  किनारे ठेले और रेडी लगाने वाले  लघु कारखाना में छोटे-मोटे काम करने, रिक्शा खींचने माल ढुलाई आदि का काम करने वाले है , घरों तथा होटलों में काम कर परिवार का पालन पोषण करने वाले लोग बंदी के बाद मजबूर हैं वहीं कुछ बुद्धिजीवी लोग इन्हें बीमारी के रूप में देख रहे है वहीं इस बीमारी के लिए ये कभी भी दोषी नहीं थे मगर ये बात भी सच है अगर लोग शहरों से गांव जाते है तो हो सकता संक्रमण भी साथ चला जाए मगर बेचारे करे भी तो क्या ? 
 पूर्ण बंदी के घोषणा के बाद जो समस्यये पैदा हुई है उससे गरीब बेघर लोगो की मुश्किलें और भी बढ़ गई है।
 लगभग पूरे देश के अलग अलग हिस्से में काम करने वाले लोग अपने गांव वापस जाना चाहते है । ताजा उदाहरण दिल्ली के आनंदविहार बस स्टैंड से लेकर केरला के सड़कों पर उतरे लोग इसका प्रमाण है।

केंद्र एवं राज्य सरकारों ने गरीब लोगों के लिए कई राहत पैकेज का ऐलान किया है मगर उनमें भी कई अड़चने है, जिस पर काम किया जा रहा है  हालाकि कमोवेश सभी राज्य सरकरें तथा सहकारी ए न जी ओ भी बखूबी साथ दे रहे है लोगो को खाना खिलने में, कई रैन बसेरे खोले गए हैं जिनसे लोगों  ज्यादा परेशानी का सामना ना करना पड़े 
मगर इन सभी से परे एक बार हमे उनकी तकलीफ़ भी समझने की कोशिश करनी चाहिए आखिर लोग इतना अतांकित क्यों हो रहे थे  जो अपने 100 200 500 1000 किलोमीटर दूर घरों के लिए पदैल ही पूरे परिवार के साथ निकल पड़े है बिना जान की परवाह किए ,यकीन मानिए जो उनपे बित रही है वह बीमारी से पहले भूख से मर जाने की एक  कठोर चिंता है छोटे छोटे बच्चे महिलाएं पुरुष अपने कंधों पर समान के गठरी लिए पैदल बस पैदल चलते जा रहे हैं बिना लाठियों के चिंता किए ।

हालाकि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने लोगों को बाहर उनके घर तक पहुंचाने  के लिए कई बसों का परिचालन भी कर रही है मगर यह आंकड़ा इतना अधिक है कि सबको पहुंचा पाना मुमकिन नहीं है लोग ट्रकों और बसों में जानवरों की तरह ठुसे जा रहे हैं जिसे जहां भी जगह मिल रही है वह अपने घर को पहुंच जाना चाहता है वही अभी सभी महानगरों के बॉर्डर पर लोगों के लिए शेल्टर होम्स बनाए जा रहे हैं और लोगों को ठहराने की पूरी कोशिश की जा रही है। समस्याएं तो बहुत है मगर हमें इस विषाणु संक्रमन के  विशाल खतरे से साथ लड़ना है और इस मुश्किल घड़ी को हम सरकार और प्रशासन का साथ दे कर ही इससे जीत सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि जो जिंदगी ठहर चुकी है फिर से वापस अपने रास्ते पर लौट आएगी।


Photo Source - Facebook

Abhishek Guarav

Thursday, March 26, 2020

आने वाले ख़तरे को पहचाना जरूरी

Covid 19 महामारी पूरे विश्व को इस तरह अपने चपेट में ले रखा है जो आज किसी से नहीं छीपा है ताजा अकड़ो के अनुसार भारत में 16 लोगों की अब तक जान जा चुकी है और 656 से जायदा लोग इससे ग्रसित है स्थिति सच में बहुत भयावह है । मगर जिस तरह से लोग अभी भी यहां इसकी गंभीरता को नहीं समझ रहे है, यह उनके मानव और मानवीयता पर एक सवाल है जबकि सरकार हर संभव प्रयास कर रही है जागरूकता फैलने की  अतः हम सभी को इसकी गंभीरता को समझना होगा।
वहीं आज एक और बड़ा सवाल उठ रहा जो इससे भी खतरनाक महामारी की ओर इशारा कर रहा है । जी हा पूरी दुनिया समेत भारत में जो मास्क और मेडिकल कीट लोगो द्वारा इस्तमाल किया जा रहा है उसका निस्तारण एक बड़ी समस्या है जो कि भविष्य को भी प्रभावित कर सकता है किसी संक्रमित व्यक्ति द्वारा उपयोग की गई कोई इस तरह की सामग्री सीधा नदी या तालाब में जाएगा तो विषाणु पानी में फ़ैल सकता है वहीं इसके बाद परिणाम और बुरे हो सकते है । चुकी  हम सभी को इस बात का खास ध्यान रखना होगा कि हम मास्क इत्यादि चीजों को डस्टबिन में ही फेके तथा सरकार को भी खासा ध्यान रखना चाहिए इनका निपटारा सही तरीके से हो।

#covid19 #stayathome #StayHealthy

Monday, December 30, 2019

हैरान हूं

हैरान हूं परेशान हूं 
अभी भी मैं किसान हूं
धुएं का जो गुबार है
उठ रहा बारंबार है
खालिआन जो अब शांत है
सड़क पे  उतरा प्रांत  है।
देश अपना जान के,
चल रहा मैं शान से,
मगर ये कैसी ज्योत है?
जो जल रही जला रही
बस आग ही फैला रही,
हैरान हूं परेशान हूं 
हां मै वही गुजरा हुआ नौजवान हूं

पर्वत पर बैठे हैं महादेव

मोोर्य कालिन गुफाओं के साथ हर हर महादेव                                                                       PC - Internet हिन्दू धर्म के म...