पूर्ण बंदी का सातवां दिन पूरा होने को है लोग अपने - अपने तरीके से समय गुजार रहे है। वही इंटरनेट लोगों का सहारा बन गया है, लोग सोशल मीडिया पर अपने अपने विचार प्रकट एवं साझा कर रहे है कोई अपने डांस के विडियोज ,मजाकिया विडियोज ऐसे ही कई और अपने किसी कला को लोगो के साथ साझा कर रहे है। मगर इन सबों के बीच सबसे मशहूर कुछ हो रहा है तो आम लोगो को पुलिस के द्वारा पिटा जाने का वीडियो लोग खूब जम के शेयर अथवा लाईक कर रहे है । भारी मांग के बाद दूरदर्शन पर शुरु हुए (हालाकि जब लाखों लोग सड़क पर भूखे और सहमे पैदल चल रहे है वहीं ये मांग कौन सी जनता ने की उनका पता नहीं चला है अभी तक) रामायण और महाभारत भी इतना नहीं देखा जा रहा जितना लोग पिटाई के विडियोज का लुफ्त उठा रहे है । अब यह कितना सही या गलत है इन सब को छोर कर भी देखे तो हमे ये सोचने की जरूरत है कि हमे हिंसा इतना क्यों पसंद आ रहा है । जो लाठियां आम लोगो पर बरस रहीं है उसका दर्द केवल वही समझ पा रहे है । क्या हम सभी इतने संवेदनहीन हो गए की किसी का दर्द भी हमारे मनोरंजन का साधन बन जाए ?
संक्रमण को रोकने के लिए लगाई गई पूर्ण बंदी के बाबजूद गरीबी और लाचारी से महानगरों से पलायन कर रहे लोग दिहाड़ी मजदूर, सड़कों के किनारे ठेले और रेडी लगाने वाले लघु कारखाना में छोटे-मोटे काम करने, रिक्शा खींचने माल ढुलाई आदि का काम करने वाले है , घरों तथा होटलों में काम कर परिवार का पालन पोषण करने वाले लोग बंदी के बाद मजबूर हैं वहीं कुछ बुद्धिजीवी लोग इन्हें बीमारी के रूप में देख रहे है वहीं इस बीमारी के लिए ये कभी भी दोषी नहीं थे मगर ये बात भी सच है अगर लोग शहरों से गांव जाते है तो हो सकता संक्रमण भी साथ चला जाए मगर बेचारे करे भी तो क्या ?
पूर्ण बंदी के घोषणा के बाद जो समस्यये पैदा हुई है उससे गरीब बेघर लोगो की मुश्किलें और भी बढ़ गई है।
लगभग पूरे देश के अलग अलग हिस्से में काम करने वाले लोग अपने गांव वापस जाना चाहते है । ताजा उदाहरण दिल्ली के आनंदविहार बस स्टैंड से लेकर केरला के सड़कों पर उतरे लोग इसका प्रमाण है।
केंद्र एवं राज्य सरकारों ने गरीब लोगों के लिए कई राहत पैकेज का ऐलान किया है मगर उनमें भी कई अड़चने है, जिस पर काम किया जा रहा है हालाकि कमोवेश सभी राज्य सरकरें तथा सहकारी ए न जी ओ भी बखूबी साथ दे रहे है लोगो को खाना खिलने में, कई रैन बसेरे खोले गए हैं जिनसे लोगों ज्यादा परेशानी का सामना ना करना पड़े
मगर इन सभी से परे एक बार हमे उनकी तकलीफ़ भी समझने की कोशिश करनी चाहिए आखिर लोग इतना अतांकित क्यों हो रहे थे जो अपने 100 200 500 1000 किलोमीटर दूर घरों के लिए पदैल ही पूरे परिवार के साथ निकल पड़े है बिना जान की परवाह किए ,यकीन मानिए जो उनपे बित रही है वह बीमारी से पहले भूख से मर जाने की एक कठोर चिंता है छोटे छोटे बच्चे महिलाएं पुरुष अपने कंधों पर समान के गठरी लिए पैदल बस पैदल चलते जा रहे हैं बिना लाठियों के चिंता किए ।
हालाकि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने लोगों को बाहर उनके घर तक पहुंचाने के लिए कई बसों का परिचालन भी कर रही है मगर यह आंकड़ा इतना अधिक है कि सबको पहुंचा पाना मुमकिन नहीं है लोग ट्रकों और बसों में जानवरों की तरह ठुसे जा रहे हैं जिसे जहां भी जगह मिल रही है वह अपने घर को पहुंच जाना चाहता है वही अभी सभी महानगरों के बॉर्डर पर लोगों के लिए शेल्टर होम्स बनाए जा रहे हैं और लोगों को ठहराने की पूरी कोशिश की जा रही है। समस्याएं तो बहुत है मगर हमें इस विषाणु संक्रमन के विशाल खतरे से साथ लड़ना है और इस मुश्किल घड़ी को हम सरकार और प्रशासन का साथ दे कर ही इससे जीत सकते हैं और आशा कर सकते हैं कि जो जिंदगी ठहर चुकी है फिर से वापस अपने रास्ते पर लौट आएगी।
Abhishek Guarav